इश्क़ दफ़न है कहीं दिल के कोने में
कहीं सामने आए तो राज़ ना खुल जाए
पन्ने भर पलट-पलट कर तेरी तारीफ़ लिखी
मगर हम तुम्हें चाहते हैं ये लिख न पाए
आए तो थे तेरे शहर में हम
लेकिन तुमसे मुलाक़ात हो न पाए
सच्चा वाला इश्क़ किया था हमने
लेकिन तुम पूरा कर भी न पाए
शयन से उठता हर रोज़ सुबह
बस तेरी ही याद आए
प्यार तो था मगर कह नहीं पाए
तक़ल्लुफ़ इश्क़ की हम नुमाइश कर न पाए
आरज़ू भी थी तमन्नाएँ भी थीं
मगर तुम मेरी आशिकी को समझ न पाए
जब तक देखा चेहरा ज़ुल्फ़ों से हटाके
लगा चाँद का टुकड़ा ज़मीं पे उतर आए
बात हुई थी दिल लगाने की
लेकिन तुम नज़रें भी न मिला पाए
प्यार तो था मगर कह नहीं पाए
रुक कर पूछ लिया होता श्रुति हाल ए दिल
अब भी तड़प है तेरे प्यार में
क्या पता वो इश्क़ तुम्हें दोबारा हो जाए
प्यार तो था मगर हम कह नहीं पाए।