अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
- गुलज़ार
'मीर' अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
- मीर तक़ी मीर
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते
- मजरूह सुल्तानपुरी
ज़िंदगी शम्अ की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुबह तो कर जाऊँगा
- अहमद नदीम क़ासमी
कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं
- अंजुम रहबर
ख़्वाबों पर इख़्तियार न यादों पे ज़ोर है
कब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में
- फ़ातिमा हसन
Urdu Poetry: गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी