आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क़ दफ़न है कहीं दिल के कोने में

                
                                                         
                            इश्क़ दफ़न है कहीं दिल के कोने में
                                                                 
                            
कहीं सामने आए तो राज़ ना खुल जाए

पन्ने भर पलट-पलट कर तेरी तारीफ़ लिखी
मगर हम तुम्हें चाहते हैं ये लिख न पाए

आए तो थे तेरे शहर में हम
लेकिन तुमसे मुलाक़ात हो न पाए

सच्चा वाला इश्क़ किया था हमने
लेकिन तुम पूरा कर भी न पाए

शयन से उठता हर रोज़ सुबह
बस तेरी ही याद आए

प्यार तो था मगर कह नहीं पाए

तक़ल्लुफ़ इश्क़ की हम नुमाइश कर न पाए
आरज़ू भी थी तमन्नाएँ भी थीं
मगर तुम मेरी आशिकी को समझ न पाए

जब तक देखा चेहरा ज़ुल्फ़ों से हटाके
लगा चाँद का टुकड़ा ज़मीं पे उतर आए

बात हुई थी दिल लगाने की
लेकिन तुम नज़रें भी न मिला पाए

प्यार तो था मगर कह नहीं पाए

रुक कर पूछ लिया होता श्रुति हाल ए दिल
अब भी तड़प है तेरे प्यार में
क्या पता वो इश्क़ तुम्हें दोबारा हो जाए

प्यार तो था मगर हम कह नहीं पाए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर