विज्ञापन

एक और निर्भया

Vinod H.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थी ए ख़ास ख़बर
        
                                                    
                            
आज़ आम हो गई
पांडवों के बीच फ़िर
द्रौपदी नीलाम हो गई
कुंद हो गई पौरुषता
क्रूरता की भरमार हो गई
उठ हो सबल नारी के
कृष्ण की चौसर में मात हो गई

थी ए ख़ास ख़बर
आज़ आम हो गई
दिया था नाम निर्भया
आज समाज की हार हो गई
उठी धुंध पाप की
रोशनी पुण्य की लोप हो गई

थी ए ख़ास ख़बर
आज़ आम हो गई
गया वक़्त सिंहवाहिनी का
के धरती सिंहों से
नी:भार हो गई
कर खुद वध
निर्दयी महिष का
महिषासुरमर्दिनि आज़ दरकार हो गई
थी ए ख़ास ख़बर आज़ आम हो गई

विनोद यादव ‘शहीद’


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all