थी ए ख़ास ख़बर
आज़ आम हो गई
पांडवों के बीच फ़िर
द्रौपदी नीलाम हो गई
कुंद हो गई पौरुषता
क्रूरता की भरमार हो गई
उठ हो सबल नारी के
कृष्ण की चौसर में मात हो गई
थी ए ख़ास ख़बर
आज़ आम हो गई
दिया था नाम निर्भया
आज समाज की हार हो गई
उठी धुंध पाप की
रोशनी पुण्य की लोप हो गई
थी ए ख़ास ख़बर
आज़ आम हो गई
गया वक़्त सिंहवाहिनी का
के धरती सिंहों से
नी:भार हो गई
कर खुद वध
निर्दयी महिष का
महिषासुरमर्दिनि आज़ दरकार हो गई
थी ए ख़ास ख़बर आज़ आम हो गई
विनोद यादव ‘शहीद’
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