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सोचता हूं ए जिन्दगी तेरी मैं हर बात लिखूं

Vinay Panday

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक्त से मिले हर जख्मों को, एक नई सौगात लिखूं।
        
                                                    
                            
आंखों से गिरते अश्कों को, मोती सा बरसात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
रही न छाया ही सिर पर, कैसे अब मैं तात लिखूं।
उजड़ी हर बस्ती को मैं, मातम की इक रात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
हार गया जब मन मेरा, कैसे अपना गात लिखूं।
मैं दर्दों का मारा पंछी, कैसे मैं जज्बात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
थे जख्म दे रहे दर्द मगर, कैसे खुद हालात लिखूं।
घर के लिए ही घर छोड़ा,जिम्मेदारी को ख्यात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
था नया परिंदा नए शहर में, भूखे मन की जात लिखूं।
रूखा सूखा खाकर जिंदा, कैसे बीती वो रात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
- विनय कुमार पाण्डेय "अजय"
 
9 घंटे पहले
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