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सोचता हूं ए जिन्दगी तेरी मैं हर बात लिखूं

                
                                                         
                            वक्त से मिले हर जख्मों को, एक नई सौगात लिखूं।
                                                                 
                            
आंखों से गिरते अश्कों को, मोती सा बरसात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
रही न छाया ही सिर पर, कैसे अब मैं तात लिखूं।
उजड़ी हर बस्ती को मैं, मातम की इक रात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
हार गया जब मन मेरा, कैसे अपना गात लिखूं।
मैं दर्दों का मारा पंछी, कैसे मैं जज्बात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
थे जख्म दे रहे दर्द मगर, कैसे खुद हालात लिखूं।
घर के लिए ही घर छोड़ा,जिम्मेदारी को ख्यात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
था नया परिंदा नए शहर में, भूखे मन की जात लिखूं।
रूखा सूखा खाकर जिंदा, कैसे बीती वो रात लिखूं।
सोचता हूं ए जिन्दगी ,
तेरी मैं हर बात लिखूं।
- विनय कुमार पाण्डेय "अजय"
 
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7 घंटे पहले

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