अपने ही मन का मंथन करके कभी जो देखें
कोई यहाँ खलिस है कुछ तो यहाँ भरम है !
सौहार्द की तरंगे फैली हुई फिजा में
कुछ आँधियों से बिखरे पत्ते गिरे जमीं पे
जो पतझड़ो से संभले वो ही यहां चमन है
कोई यहां खलिस है ! कुछ तो यहां भरम है
चारों तरफ उजाला फैला हुआ गगन है
अंजान सा है रस्ता सूनी पड़ी डगर है !
पगडंडियों पे चलते मिलते भी हमसफर हैं
कोई यहाँ खलिस है कुछ तो यहाँ भरम है
किसी और के दुखों से जो हम दुखी हो जायें
इंसानियत के रिश्ते को मन से जो निभाये
ये ही तो सच्ची मेहनत ये ही सही लगन है
कोई यहां खलिस है ! कुछ तो यहां भरम है !
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