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अपने में ही ढालने की कोशिश करते

vijaya Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी जिंदगी का हिस्सा थे,
        
                                                    
                            
आज तस्वीर बन गए,
बात बात में सीख देते,
मुहावरों में बात करते,
टोकते रहते,
अपने में ही ढालने की कोशिश करते,
वो चले गए,
जिंदगी जस की तस चलती,
हम भी वैसे ही बनते जाते,
सीख ही नींव,
कभी शिकायतें,
आज जिंदगी का फलसफा
मायके में मां,
आंखें बिछाए बैठी रहती,
आने के दिन गिनती,
उपहारों से झोली भर देती,
कभी जिंदगी का हिस्सा थे,
आज स्मृति बन गए,
श्राद्ध स्वरूप श्रद्धा से स्मरण करते,
मन भावन भोजन बनाते,
कौआ , कुत्ते,गाय,का ग्रास निकालते,
पंडित को जिमाते दक्षिणा देते,
सीता माता ने दिया श्राप कौआ
फाल्गुनी नदी और गाय माता को,
राजा दशरथ का श्राद्ध किया,
रामजी के समक्ष सबने किया मना,
क्रोधित हो सीता मैया ने गौ माता को कहा,
कलियुग में जूठन और कचरा खाओगी,
कौआ छीन झपट ओर लड़ लड़ कर खाएगा,
फाल्गुनी नदी सुख जाएगी,
श्राद्ध की प्रथा वैदिक काल से चली आ रही,
श्राद्ध श्रद्धा का प्रतीक,
पंडित को जिमाते वही धर्म कर्म का ज्ञान कराते,
कौआ और कुत्ता आत्मा को निकलते देखता,
गाय पूजनीय,
बहन बेटियों को बुला,
भोजन खिला दक्षिणा देते,
श्राद्ध हर साल आते,
पूर्वजों को स्मरण करते,
उनके पसंद का खाना खाते और खिलाते।
2 घंटे पहले
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