विज्ञापन

विचार और शून्य

Vartika Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिन में रात्रि में
        
                                                    
                            
सोचता रहता हूं
शून्य को
शून्य मेरे जीवन का
शून्य मेरे मन का
शून्य इस संसार का
शून्य मेरे ईश्वर का
क्या वास्तव में कुछ शून्य है
हां शून्य मेरे विचार
शून्य ये संसार
जिसका कोई अंत नहीं
जिसका कोई अनन्त नहीं
यू ही ये विचार बढ़ते बढ़ते पहुंच जाते है अन्नत क्षितिज को नापते हुए आकाश तक
मैं सोचता हूं शून्य को
दिन रात्रि प्रातः सायं काल में
शून्य की भांति मन को अन्नत कर शून्य हो जाता हूं
मैं अपने छोटे से कमरे में बैठ कर
यूनिवर्सिटी के सड़कों पर हो उठी क्रांतिनुमा धुंध को समझाता हूं
मै स्वयं शून्य हो जाता हूँ
मन के स्वयं विचारों को शून्य कर
शून्य में घुल जाता हूँ
मैं शून्य से शून्य में शून्य हो जाता हूं
वास्तव में मन को विचार शील कर
विचारों की एक नाव बनाता हूँ
अपराधों से भर उठी इस भूमि में
शराफ़त की चप्पू चलाता हूं
मैं अपनी विचारो की नाव को उस पार लगता हूं
और फिर देखता हूं
अन्नत आकाश में फैले उस शून्य को
जो संसद से उठती धूल को
सड़कों से उठते विद्रोह को
उस सरकार को जो समता भाईचारे की बातें करता है
उस लोकतंत्र को जो सत्ता के आँचल में अपने आंसुओं को आश्रय दे रहा है
हाय ईश्वर ये मै क्या देख रहा हूं
विचारों का ये सैलाब
शिक्षा बिक चुकी है रोजगार बह गया है अंधों की आंधी में
स्त्रियां आगई है सड़कों पर हाथों में विचार
और आंखों में शर्मसार कर देने वाली कहानी लेकर
ये एक सैलाब है जो शून्य से आया है
ये शून्य शून्य ही है
जो संसार को बतलाया है
एक कमरे का शून्य
एक विचार शून्य
एक स्त्री शून्य
एक नेता शून्य
और अंततः ये समाज शून्य
शून्य शून्य और शून्य

 
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Mamta Tiwari

663 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10773 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13023 कविताएं

View Profile