दिन में रात्रि में
सोचता रहता हूं
शून्य को
शून्य मेरे जीवन का
शून्य मेरे मन का
शून्य इस संसार का
शून्य मेरे ईश्वर का
क्या वास्तव में कुछ शून्य है
हां शून्य मेरे विचार
शून्य ये संसार
जिसका कोई अंत नहीं
जिसका कोई अनन्त नहीं
यू ही ये विचार बढ़ते बढ़ते पहुंच जाते है अन्नत क्षितिज को नापते हुए आकाश तक
मैं सोचता हूं शून्य को
दिन रात्रि प्रातः सायं काल में
शून्य की भांति मन को अन्नत कर शून्य हो जाता हूं
मैं अपने छोटे से कमरे में बैठ कर
यूनिवर्सिटी के सड़कों पर हो उठी क्रांतिनुमा धुंध को समझाता हूं
मै स्वयं शून्य हो जाता हूँ
मन के स्वयं विचारों को शून्य कर
शून्य में घुल जाता हूँ
मैं शून्य से शून्य में शून्य हो जाता हूं
वास्तव में मन को विचार शील कर
विचारों की एक नाव बनाता हूँ
अपराधों से भर उठी इस भूमि में
शराफ़त की चप्पू चलाता हूं
मैं अपनी विचारो की नाव को उस पार लगता हूं
और फिर देखता हूं
अन्नत आकाश में फैले उस शून्य को
जो संसद से उठती धूल को
सड़कों से उठते विद्रोह को
उस सरकार को जो समता भाईचारे की बातें करता है
उस लोकतंत्र को जो सत्ता के आँचल में अपने आंसुओं को आश्रय दे रहा है
हाय ईश्वर ये मै क्या देख रहा हूं
विचारों का ये सैलाब
शिक्षा बिक चुकी है रोजगार बह गया है अंधों की आंधी में
स्त्रियां आगई है सड़कों पर हाथों में विचार
और आंखों में शर्मसार कर देने वाली कहानी लेकर
ये एक सैलाब है जो शून्य से आया है
ये शून्य शून्य ही है
जो संसार को बतलाया है
एक कमरे का शून्य
एक विचार शून्य
एक स्त्री शून्य
एक नेता शून्य
और अंततः ये समाज शून्य
शून्य शून्य और शून्य
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