अज़ीब है सृष्टि ,
अब कफ़न पर गिद्धदृष्टि।
पहले जिंदगी ने मुंह मोड़ ली,
फिर मृत्यु ने निचोड़ ली।
अब कफ़न पर आफ़त आई है
ज़िंदगी तो पहले ही पराई है।
जब था जिंदा लाश,
अटक जाती रही सांस।
धरती पर बना रहा बोझ,
मांगा दो गज जमीन
तो हुए जमींदोज।
आज सहमा है मरघट,
कफ़न पर भी आया है संकट।
जिंदगी बनी रही अभिशाप,
लाशों पर तरेरी जा रही आंख।
मुर्दों की कहां बचेगी साख?
मौत व्यापार ;श्मशान बाजार
धरती पर है मुट्ठीभर राख।।
यहां भूख से बिलखते को नहीं मिलता निवाला,
सोसायटी में टकराता है जाम, छलकता है प्याला।
अब मरना नहीं रहा आसान,
यहां मय्यत भी है परेशान।
अजीब सा है यहां चक्रव्यूह,
तड़पकर उड़ गई रूह।
ज़िस्म बेज़ार ; माचिस औज़ार
इंसानियत हो गई दफ़न,
यहां आफ़त में है कफ़न।
खेल दौलत का,
कहर कुदरत का,
यहां मौत बन गया व्यापार।
हवेलियां सुनसान,
गांव वीरान,
शहर बन गया कारागार।।
यहां रोज रोज ,
आशियां जमींदोज।
पानी हो रहा सर के पार,
कहर कुदरत का,
सबकुछ दिख रहा आरपार।।
गिरती इमारतें; लाचार आदतें
जहां अटक जाती है सांस,
उस मरघट में भी उल्लास।
नशे का जाल ; जिंदगी बदहाल,
जहां छुओ बीमारी रोग,
शोक, क्षोभ, तड़पते लोग।
समाज यहां बेहोश है,
शायद नियति का दोष है।
-उत्तम मुखर्जी