क्या कभी पढ़ते हुए आया है तुम्हें यह ध्यान,
क्यों रामायण में नहीं हुआ उर्मिला के त्याग का बखान?
क्या इसका उद्देश्य बचाना था पुरुषों का आत्मसम्मान,
या फिर नहीं बनने देना था किसी स्त्री को महान?
कैसे एक स्त्री चौदह वर्षों तक अकेले जी गई,
नहीं लगने दिया दामन पर दाग, और सारी व्यथा पी गई।
दिखाए नहीं उसके आँसू, या फिर आँसू उसके आए ही नहीं,
या फिर महल में किसी ने उसकी पीड़ा जाननी चाही ही नहीं?
क्यों लक्ष्मण का त्याग हमें बार-बार बताया गया?
क्यों नहीं किसी पन्ने पर उर्मिला का नाम दोहराया गया?
उसके मौन की चादर को हटाकर तो देखना था,
सूखा तालाब था या विशाल समुद्र, झाँककर तो देखना था।
चुप हो जातीं वो लाखों नारियाँ, जिनको ये कहते सुना है,
पति के बिना जीवन एक काँटों का बिछौना है।
लाख बुराइयाँ हों चाहे उसमें, उसी के साथ ही रहना है,
उसी से श्रृंगार है तेरा, वही तुम्हारा गहना है।
क्यों हर युग में स्त्री के मन को अनदेखा किया गया है?
क्यों उसे पुरुष के साथ जोड़कर ही पूर्ण माना गया है?
रहने को तो रह लेती है वह सलीके से पुरुष के बिना भी,
पर हर नज़र देखती है उसे अबला और निर्बला-सी।
लेकिन अब समय आ गया है इस सोच को बदलने का,
एक नारी सब पर भारी, इस विश्वास को गढ़ने का।
देखो, बिना पुरुष के भी तुम्हारी कैसे न ऊँची शान हो,
नारी, तुम कल भी महान थीं और आज भी महान हो।