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शिव का विषपान

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                            शिव का विषपान
        
                                                    
                            

सागर मंथन जब हुआ,
हलाहल बाहर आया।
देव सभी घबराए,
शिव ने कंठ लगाया।

सृष्टि बचाने हेतु,
हलाहल स्वयं अपनाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।


घर भी सागर जैसा,
नित मंथन हो जाए।
सुख चेहरे पर रहता,
दुख भीतर रह जाए।

कोई पीड़ा सहकर,
घर में सुख बरसाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

चेहरे पर मुस्कानें,
मन का दर्द छिपाए।
अपनों की खुशियों में,
अपने स्वप्न लुटाए।

आँसू भीतर रखकर,
सबके दीप जलाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

कम पड़ जाए पैसा,
अपनी चाह घटाए।
बच्चों की खुशियों पर,
सब कुछ वार जाए।

अपनी इच्छा टालकर,
घर के स्वप्न सजाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

ताने कितने सुनकर,
फिर भी मौन निभाए।
मन के टूटे टुकड़े,
दुनिया से वह छिपाए।

घर में कलह न फैले,
हर पीड़ा अपनाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

शिव के संग शक्ति,
हर पल साथ निभाए।
नीलकंठ की पीड़ा,
बिन बोले पढ़ जाए।

त्याग अकेला क्यों हो,
हर मन यह समझाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

घर केवल दीवारें,
कब परिवार बनाएँ?
एक-दूजे की पीड़ा,
मिलकर सभी उठाएँ।

विष जब मिलकर बाँटें,
दूरियाँ मिट जाएँ।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।

शिव का विष यह बोले,
अपनों को मत खोना।
त्याग किसी का देखकर,
चुपचाप नहीं होना।

हाथ सदा थामे रखना,
प्रेम घर में बस जाए।
जो अपनों का विष पी ले,
वह शिव-सा कहलाए।
— संतोष कुमार शर्मा
3 घंटे पहले
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