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जब आत्मा खुद से मिल जाएगी।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब तक देखूँ मैं जग की बुराई,
        
                                                    
                            
कब तक सुनूँ हर ओर सफ़ाई।
चलते-चलते थक जाऊँगा मैं,
कभी तो खुद से मिल पाऊँगा मैं।

कुछ तो है जो खोज रहा हूँ,
भीड़ में जैसे खो रहा हूँ।
अच्छाई की राह पकड़ता हूँ,
पर हर मोड़ पर बुराई गढ़ता हूँ।

क्यों खोजूँ मैं? किसके लिए?
समाज कहे — “हम सबके लिए।”
पर समाज भी तो मैं ही हूँ,
फिर क्यों खुद से अनजान हूँ?

मानव कल्याण की बात करूँ,
पर पहले अपना मन तो भरूँ।
यदि भीतर ही अंधियारा है,
तो बाहर उजियारा कैसे है?

हर बार चला था अच्छाई को,
पर हाथ लगी परछाई को।
शायद गलती राहों में थी,
या मेरी ही निगाहों में थी।

कब थकेंगे ये भटकाव के पाँव?
कब मिलेगा मन को ठाँव?
कब लौटूँगा अपने आप में,
कब पहचानूँगा उस प्रताप में?

जिस दिन खुद को जान लूँगा,
अच्छाई को पहचान लूँगा।
खोज खत्म तब हो जाएगी,
जब आत्मा खुद से मिल जाएगी।
 
2 घंटे पहले
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विजय कुमार

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