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कह प्यासा कविराय

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्नी घर की धुरी
        
                                                    
                            

भोर उसी की आहट पाकर,
घर का आँगन मुस्काता है।
चाय की पहली महक उठती,
तो हर चेहरा खिल जाता है।

बस्ता-डिब्बा, दूध-नाश्ता,
उसकी नज़र सभी पर जाती है।
काम कई हैं, वक़्त ज़रा-सा,
फिर भी हँसती जाती है।

रात थकी चौखट पर बैठी,
फिर कल की फ़िक्र सताती है।
सबकी खातिर जीकर वह,
घर की धुरी बन जाती है।

दवा समय पर रख देती है,
सेवा में सुकून वह पाती है।
पति की ख़ामोश थकन पढ़ती,
हर उलझन समझ जाती है।

बच्चों के सपने सँजोती है,
आँखों में फिर सजाती है।
घर का हर रिश्ता अपना है,
सब पर बराबर नेह लुटाती है।

किसको क्या कब चाहिए है,
मन में सब दोहराती है।
सबकी खातिर जीकर वह,
घर की धुरी बन जाती है।

थाली सबको पहले देती,
रोटी उसकी ठंडी हो जाती है।
नई कमीज़ बच्चों को देकर,
साड़ी फिर पुरानी रह जाती है।

बुखार बदन में जलता रहता,
होंठों पर मुस्कान सजाती है।
दर्द किसी से कह न पाती,
तकिए को हर रात बताती है।

ख़्वाहिश अपनी मोड़ के रखती,
हर कमी घर की मिट जाती है।
सबकी खातिर जीकर वह,
घर की धुरी बन जाती है।

रिश्तों की हर गाँठ समझती,
नर्मी से उसको सुलझाती है।
रूठे चेहरे पढ़ लेती है,
अपनी हँसी से मनाती है।

त्योहारों की थाली सजती,
वह खुशियों के रंग मिलाती है।
मुश्किल आकर द्वार हिलाती,
वह खुद ढाल बन जाती है।

बिखरे मन को बाँहों में भरती,
फिर एक सूत्र में लाती है।
सबकी खातिर जीकर वह,
घर की धुरी बन जाती है।

दो दिन मायके क्या जाती है,
हर चीज़ उसे बुलाती है।
खाली तकिया, सूना आँगन,
उसकी कमी बतलाती है।

तब एहसास हमें होता है,
वह कितना घर बनाती है।
उसके सपने भी अपने हैं,
यह बात आँख भर लाती है।

थोड़ा उसका हाथ बँटाएँ,
गृहस्थी फिर मुस्काती है।
सबकी खातिर जीकर वह,
घर की धुरी बन जाती है।
— संतोष कुमार 
एक घंटा पहले
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