कृष्ण आज होते तो
कृष्ण अगर आज आते,
गीता फिर समझाते।
रण से पहले रुककर,
शांति-पथ दिखलाते।
शव पर कैसी विजय,
यह प्रश्न जगाते।
मानवता सबसे ऊपर,
कृष्ण यही समझाते।
सीमा पर आग जलती,
बस्तियाँ राख होतीं।
महलों में निर्णय होते,
माएँ घर में रोतीं।
युद्ध रोकने की राहें,
कृष्ण पहले खोजते।
शस्त्र उठाने से पहले,
संवादों को जोड़ते।
धर्म अगर बाँटे मन,
कैसा धर्म कहलाए?
नफ़रत बोए जो मन,
कैसे पुण्य कमाए?
प्रेम जहाँ मर जाए,
कृष्ण वहाँ समझाएँ।
मानवता ही धर्म है,
सबको गले लगाएँ।
राजनीति नीति भूले,
सत्ता जब मद लाए।
सच की आवाज़ दबे,
झूठ शिखर चढ़ जाए।
राजधर्म जनहित हो,
कृष्ण यही बतलाएँ।
कुर्सी सेवा बन जाए,
ऐसी राह दिखाएँ।
आज अर्जुन फिर उलझा,
कुरुक्षेत्र नया हुआ।
अपने-पराए के बीच,
मन फिर डरा हुआ।
सच चुनना ही धर्म,
कृष्ण उसे समझाते।
पक्ष नहीं, सत्य चुनो,
फिर गीता दोहराते।
बमों का गर्व बढ़ा,
शक्ति का शोर हुआ।
मलबे में बचपन दबा,
जीवन कमजोर हुआ।
शक्ति बने यदि ढाल,
कृष्ण यही बतलाते।
निर्बल की रक्षा में,
सुदर्शन भी उठाते।
शांति नहीं कमजोरी,
यह साहस कहलाए।
अन्याय अगर बढ़ता,
प्रतिरोध धर्म बन जाए।
पहले संवाद चुनो,
कृष्ण यही समझाएँ।
पर अन्याय अड़े तो,
धर्म हेतु डट जाएँ।
धरती सबकी साँझी,
क्यों रक्त इसे नहलाए?
जीत अगर घर उजाड़े,
कौन विजय कहलाए?
युद्ध अंतिम ही राह,
कृष्ण यही बतलाएँ।
मानवता प्रथम रहे,
तभी कृष्ण मुस्काएँ।
— संतोष कुमार शर्मा