तमसा तट पर बाण चला तो, क्रौंच-विहग का स्वर अकुलाया,
करुण पुकार सुनी वाल्मीकि ने, ऋषि का अंतर भर आया।
पीड़ा ने जब छंद सँवारा, प्रथम श्लोक साकार हुआ,
शोक ढला जब श्लोक रूप में, रामायण का दीप जलाया।
एक पक्षी की पीड़ा ने भी, मानव का संवेदन जगाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
सात कांड में सात रंग हैं, रामकथा की गहराई,
बाल्यकाल से राज्यधर्म तक, जीवन की हर दशा समाई।
चैत्र शुक्ल नवमी की बेला, राम अवध में जन्मे थे,
दशरथ के सूने आँगन ने, चार पुत्रों की खुशी मनाई।
ईश्वर ने भी मानव बनकर, मर्यादा को अपनाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
विश्वामित्र पुकार उठे तो, राम चले कर्तव्य निभाने,
लक्ष्मण भी संग-साथ चले थे, गुरु का हर आदेश निभाने।
ताड़का का आतंक मिटाया, यज्ञभूमि निर्भय कर दी,
चरण-स्पर्श से अहल्या जागीं, जीवन के नव स्वर पहचाने।
शक्ति वही जो रक्षा करती, रामकथा ने समझाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
मिथिला में शिव-धनुष रखा था, बड़े-बड़े बलवान थे आए,
वीर बहुत अभिमान लिए थे, किंतु उसे वे हिला न पाए।
राम उठे गुरु की आज्ञा पर, धनुष सहज ही टूट गया,
सीता ने जयमाल पहनाई, मंगल के सब स्वर लहराए।
बल से ऊपर विनय सदा है, जग को राम ने बतलाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
जनकपुरी में मंगल गूँजा, चारों जोड़े साथ सुहाए,
चारों बहनों ने अवधपुरी में, प्रेम-दीप नव-नव जलाए।
मार्ग रोक परशुराम खड़े थे, क्रोध भरा था वचन-वचन में,
राम-विनय ने उनके मन के, उग्र उठे सब भाव मिटाए।
संयम के आगे क्रोध झुका है, सौम्य भाव ने समझाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
राजतिलक की बेला आई, अवधपुरी में खुशी छाई,
कैकेयी ने दो वर माँगे, वन की कठिन घड़ी ले आई।
राम हँसे और राज छोड़कर, पिता का वचन निभाने चले,
दशरथ टूटे, अवध रो पड़ी, उर्मिला ने पीर छिपाई।
सुख से बढ़कर वचन बड़ा है, रघुवर ने यह दिखलाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
गंगा तट पर निषादराज ने, सच्चे मन से साथ निभाया,
केवट ने चरणों को धोकर, भवसागर का मर्म सुनाया।
उधर भरत ने राज न माना, वन में राम मनाने आए,
पादुकाएँ सिंहासन पर रख, नंदिग्राम में धर्म निभाया।
सत्ता सेवा बन सकती है, भरत-चरित ने समझाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
वन-पथ पर ऋषियों की रक्षा, राम निरंतर करते आए,
शबरी के मीठे बेरों ने, भक्ति के सच्चे भाव जगाए।
सोने के मृग की माया चमकी, रावण सीता हर ले गया,
नारी की मर्यादा खातिर, जटायु ने भी प्राण गँवाए।
निर्बल तन में साहस जागे, प्रेम ने जब हाथ बढ़ाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
ऋष्यमूक पर राम-लखन को, पवनपुत्र हनुमान मिले,
सेवक को आराध्य मिले तो, भक्ति के सौ कमल खिले।
सुग्रीव को विश्वास दिलाया, बालि-वध से न्याय किया,
जामवंत ने याद दिलाया, भीतर कितने बल थे पले।
सोई हुई शक्ति को जगाकर, लक्ष्य तलक पहुँचाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
सागर लाँघ चले हनुमत तो, नभ ने उनका साहस देखा,
सुरसा, सिंहिका, लंकिनी ने, उनके बल का रूप भी देखा।
अशोक-वाटिका में सीता को, राम-मुद्रिका सौंप उन्होंने,
आशा का संदेश सुनाकर, मिटा निराशा का हर लेखा।
सच्चा दूत वही है जिसने, टूटे मन को हर्षाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
रावण के दरबार खड़े हो, हनुमत सत्य सुनाते थे,
पूँछ जली तो लंका जलती, फिर भी राम-नाम गाते थे।
विभीषण ने नीति बचाई, अपना घर तक छोड़ दिया,
राम शरण में आए जन को, प्राणों जैसा अपनाते थे।
शरणागत की रक्षा करना, धर्म सदा कहलाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
नल-नील ने शिला सँभाली, सागर पर सेतु बन गया,
रामेश्वर में शीश झुकाकर, शिव से राम का भाव जुड़ गया।
अंगद का दृढ़ पाँव सभा में, रावण तक को चेताता था,
लक्ष्मण मूर्छित हुए तो हनुमत, बूटी लाए, संकट टल गया।
बुद्धि, श्रम और भक्ति मिलें तो, असंभव संभव पाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
कुंभकर्ण और मेघनाद का, रण में भारी तेज जगा,
दस सिर वाला रावण भी फिर, सत्य के सम्मुख नहीं टिका।
विभीषण ने भेद बताया, राम ने अंतिम बाण चलाया,
अहंकार का स्वर्ण-महल भी, धर्म की आँधी बीच गिरा।
ज्ञान अगर अभिमान बने तो, अंत निकट ही आया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
पुष्पक लेकर राम लौटे तो, दीप जले सरयू के किनारे,
चौदह वर्षों बाद अवध ने, अपने सूने भवन सँवारे।
रामराज्य में न्याय मिला था, जन की पीड़ा अपनी थी,
राजा ने परिवार मानकर, हर जीवन के कष्ट निवारे।
शासन वही महान हुआ जो, अंतिम जन तक आया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
लोक-वचन की आँधी आई, सीता ने फिर वन अपनाया,
वाल्मीकि के शांत आश्रम ने, लव-कुश को संस्कार सिखाया।
पुत्रों ने जब रामसभा में, रामकथा का गान किया,
धरती की बेटी ने आखिर, धरती-माँ में ठौर ही पाया।
सीता के धीरज ने जग को, स्वाभिमान सिखलाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
राम विवेक, सिया करुणा हैं, लक्ष्मण दृढ़ संकल्प हमारे,
भरत त्याग, हनुमान समर्पण, मिलकर जीवन-पंथ सँवारे।
रावण अब भी अहंकारों में, मंथरा कुटिल विचारों में,
राम बसे उस मन-मंदिर में, जहाँ प्रेम के जलते तारे।
जब-जब मानव भटका जग में, इस गाथा ने दीप जलाया है—
हर युग को रामायण ने, जीवन-धर्म सिखाया है॥
— संतोष कुमार शर्मा