धरती की गहरी तहों में,
जहाँ ताप बहुत बढ़ जाता है,
शैल पिघलकर मैग्मा बनती,
अग्नि का सागर लहराता है।
ऊपर कठोर भू-पर्पटी है,
नीचे तपता संसार,
मैग्मा जब ऊपर बढ़ता है,
बढ़ता जाता उसका भार।
गैसों का दबाव बढ़े जब,
धरती की नसें तन जातीं,
दरारों और कमजोर हिस्सों से
अग्नि की राह बन जाती।
फिर फूट पड़ता ज्वालामुखी,
गर्जन से नभ काँप उठे,
लावा बनकर तप्त मैग्मा
धरती पर बहता जाए।
राख, धुआँ और गैसों के बादल
आकाश को ढक लेते हैं,
पिघली चट्टानों की धाराएँ
नई धरती रच देती हैं।
पर ज्वालामुखी केवल विनाश नहीं,
सृजन की कहानी भी है,
लावा ठंडा होकर बनता शैल—
धरती की नई निशानी भी है।
कभी राख में जीवन रुकता है,
कभी मिट्टी उपजाऊ होती है,
विनाश की उस तपती गोद में
नई प्रकृति भी सोती है।
जैसे धरती अपने भीतर
ताप और दबाव सँजोती है,
वैसे मन भी भाव छिपाकर
कभी अचानक रोती है।
इसलिए ज्वालामुखी कहता है—
हर मौन के भीतर आग नहीं,
पर जो दबाव अनंत बढ़े,
उसका विस्फोट असंभव नहीं।
-रोशनी पाण्डेय