अँधेरा राह रोके तो नज़र तैयार कर लेना,
हर इक मुश्किल को जीने का नया औज़ार कर लेना।
अगर दीवार राह रोके, न रस्ता बदल देना,
उसी दीवार को सीढ़ी में शुमार कर लेना।
कोई राहों में पत्थर रख दे, मायूस मत होना,
उन्हीं पत्थरों से अपनी नींव तैयार कर लेना।
भँवर में टूट जाए नाव, साहिल मत पुकारना,
बचे तख़्ते को हाथों की पतवार कर लेना।
ज़माना बात सुनने से तुम्हारी जब मुकर जाए,
उसी ख़ामोशी से सच का इज़हार कर लेना।
अगर अपने तुम्हें मझधार में तन्हा छोड़ जाएँ,
उसी पल अपने साहस को मददगार कर लेना।
शिकस्त दर पर आकर जब तुम्हें देख मुस्कराए,
उसे उस्ताद कहकर दिल से नमस्कार कर लेना।
अगर दुनिया तुम्हारे ख़्वाब पर खुलकर हँसे इक दिन,
उसी हँसी को हिम्मत का नया आधार कर लेना।
हवा जब घर के सारे दीप बुझाकर चली जाए,
बची चिंगारियों को फिर से अंगार कर लेना।
अकेलापन अगर कमरे में आकर साथ बैठ जाए,
उसे ख़ुद से मुलाक़ात का त्योहार कर लेना।
कोई ज़ख़्म उम्र भर भरने से साफ़ इनकार कर दे,
उसी ज़ख़्म को औरों के दुख का उपचार कर लेना।
जेब खाली हो तो ख़ुद को मुफ़लिस मत समझ लेना,
दुआओं को कमाई में ज़रा शुमार कर लेना।
समय छीन ले तुमसे तुम्हारी प्रिय निशानी भी,
उसी खाली जगह को याद का संसार कर लेना।
कभी मैं पास न होऊँ और राहें पूछती हों कुछ,
मेरी आवाज़ से पहले स्वयं पर ऐतबार कर लेना।
‘संतोष’ की इन बातों को फ़रमान मत समझना,
जो दिल को छू सके, उस पर ज़रा विचार कर लेना।
— संतोष कुमार शर्मा