बच्चे को बच्चा रहने दो
एक बच्चा जब स्कूल जाता है,
रोकर जाता है या हँसकर जाता है।
स्कूल ही वह पहली जगह है,
जहाँ वह बिना माँ के जाता है।
जब वह स्कूल पहुँचता है,
खुद को अनजान पाता है।
कहने को तो बहुत कुछ है वहां,
पर वह हर रिश्ते को बेनाम पाता है।
धीरे-धीरे से वह इस माहौल में
कुछ ऐसे ढल जाता है,
ढूँढता है सहपाठियों में भाई-बहन,
और टीचर में माँ का अंश पाता है।
मैं उन सभी अध्यापिकाओं से
बस एक गुज़ारिश करती हूँ—
उसका यह विश्वास न टूटे,
बस यही प्रार्थना करती हूँ।
मत बाँधो इन नन्हे-मुन्नों को
अनुशासन की बेड़ियों से,
गूँजने दो कक्षा-कक्ष को
उनकी हँसी-किलकारियों से।
रंगने दो किताबों को,
ये दुनिया रंगीन बना देंगे।
कपड़े गंदे हुए तो क्या,
टाइड से चमका देंगे।
पढ़ लो उनके मन की बातें,
ये मासूमियत की पुड़िया हैं।
तुम भी दिखाओ अपनी नज़र से,
कितनी हसीन ये दुनिया है।
आज ये आवाज़ें दब गईं तो
फिर नहीं उठ पाएँगी,
अन्याय के पत्थरों से
ये नहीं टकरा पाएँगी।
यही गुज़ारिश मैं बच्चों की
माताओं से भी करती हूँ—
तुम भी जी लो थोड़ा बचपन,
यही प्रार्थना करती हूँ।
मत रोको इनको दीवारों पर
पेंसिल-पेन चलाने से,
मत रोको फूलदान के फूल
बालों में सजाने से।
घर की सारी चादर ले जाकर
अपना महल बनाने से,
मत रोको इनको कागज़ के
एरोप्लेन बनाने से।
इन पर मत थोपो हर पल
दुनिया के तौर-तरीके तुम।
इनको खुद भी गिरने दो, बस
संभलने का दो मौका तुम।
फिर देखना, तुम्हारी सारी
चालाकियाँ यूँ धरी रह जाएँगी,
एक झटके में ही कोई नई खोज
झट से सामने आ जाएगी।
मत तोलो इन बच्चों को
अंकों की तराजू में।
ये बचपन नहीं मिलता है उस पर
जो दुकान है आपके बाजू में।
-पूजा शर्मा