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नई उमर में सपने

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नई उमर में सपने ऊन की तरह उलझते।
        
                                                    
                            
सुलझ जाए जो उन्हें आँचल में सहेजते।।

साँस भी सोचने लगे हदो में रहना जरूरी।
ऐसे लोग कभी नही चिनगारी में सुलगते।।

फिर अपनी चादर बुन लेना तुम गरिमा की।
प्रेरित होकर नये रास्ते इन्हीं चाल में बनते।।

समझाने की जद्दोजहद में नरमी न खोना।
भविष्य की बनाई गई फाइलों में झाँकते।।

कभी माँ की आँखों ने दिशा निर्देश दिया।
सही राह 'उपदेश' खुद के भीतर में जगते।।

बेटियों को सलाह है इतना मत फैल जाना।
फैलो तो बस उतना खुद के काबू में रहते।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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