विज्ञापन

नियति का ही निमन्त्रण स्वीकार होगा

Two line

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितने तीर पार करें
        
                                                    
                            
कितने रुप रुग्ण भये
अन्तद्वन्द है की जाता नहीं
भीतर बहुरंगा मैल है
सामना करूं फिर क्या इंसान का
करुण स्वर भी समझाता रहा
वीभत्सा ही साथ चलता रहा
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
मानुष है शायद
फिर क्यो कलंकित तृष्णा के स्वर
जनमानुष के पार भये
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
ये भ्रम है कि
सब पाये है
नियति का जब
कोप होगा
पर्याप्त सामर्थ होगा
फिर भी
नियति का ही
निमन्त्रण स्वीकार होगा
कितने तीर पार करें
कितने रुप रुग्ण भये
......................
...................... ---- बिजय जोशी
(पिथौरागढ़)

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10845 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7356 कविताएं

View Profile

Saurabh Joshi

2 कविताएं

View Profile