खुद से ही कहीं दूर निकल आई हूं,
अपने ही खयालों की भीड़ में तनहा रह गई हूं।
दुनिया के रंग चेहरे पर मुस्कान की तरह सजा लेती हूं, पर भीतर की पहचान को जाने क्यों हर पल छुपा लेती हूं।
लोग समझते हैं मैं दुनिया से जुड़ जाऊंगी,
खुलकर हंसूंगी, बातें करूंगी, सब बताऊंगी।
पर मेरे होंठ चुप रहते हैं, दिल की आवाज भीतर टूटती है,
खामोशी की गहराई कोई नहीं पढ़ पाता, सब अनसुना छूटता है।
कभी महसूस होता है जैसे मैं इस जगह की नहीं हूं,
यहां मेरी आवाज की धुन भी किसी को सुनाई नहीं देती।
फिर भी इस लंबी तन्हा राह में मैं खुद को तलाश रही हूं, बिखरे हुए अस्तित्व को धीरज से फिर से जोड़ रही हूं।
अभी भी मन करता है खुद से मिल जाऊं,
जिस हिस्से को खो दिया था उसे दिल से लगा आऊं। दुनिया की राहें, उम्मीदों का बोझ सब यहीं छोड़ दूं,
और बस अपनी खुशी, अपनी सांस, अपना सुकून ढूंढ लूं।