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मैं बनारस हो गया

Sudheer Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।
        
                                                    
                            

नयनों में घुला जब विष शिव का, हम सुध बुध अपनी खो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


लय कम क्यों हो मुझमें गंगा से, जब भांग रूह में घोल लिया , जब मिलन हुआ ख़ुद से ख़ुद का हम फूट फूट कर रो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


कुछ बात कही कुछ बात सुनी, यूं तनातनी हुई घाटों से, वो पत्थर बन कर पड़े रहे, हम स्वयं गंगा के हो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।

मिल राम रहीम ने रचा है इसे, केसरिया और हरे रंग से, वो किया करते हैं वजू इसमें, हम पापों को अपने धो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


भोर से रैन हुई जाने कब, कब आरती को हमने आजान सुना, कहा शोर जिसको सबने, उसे शांति बना हम सो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।

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