आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mai Banaras ho gya.. I became Banaras

मेरे अल्फाज़

मैं बनारस हो गया

Sudheer Yadav

1 कविता

57 Views
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।

नयनों में घुला जब विष शिव का, हम सुध बुध अपनी खो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


लय कम क्यों हो मुझमें गंगा से, जब भांग रूह में घोल लिया , जब मिलन हुआ ख़ुद से ख़ुद का हम फूट फूट कर रो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


कुछ बात कही कुछ बात सुनी, यूं तनातनी हुई घाटों से, वो पत्थर बन कर पड़े रहे, हम स्वयं गंगा के हो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।

मिल राम रहीम ने रचा है इसे, केसरिया और हरे रंग से, वो किया करते हैं वजू इसमें, हम पापों को अपने धो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।


भोर से रैन हुई जाने कब, कब आरती को हमने आजान सुना, कहा शोर जिसको सबने, उसे शांति बना हम सो बैठे।
एक कदम रखा क्या बनारस में, हम ख़ुद ही बनारस हो बैठे।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!