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आत्म-मंथन

Sudhanshu Kaushik

Mere Alfaz
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                            ऐ मंद हंसी तू यह तो बता, मैं कब चाहूँ तू मुझे चाहे
        
                                                    
                            
तू स्वयं ही बता है मंद हंसी क्या अर्थ है कुछ उन बातों में
यदि तूने यह समझा होगा, तो मैंने भी तो समझा होगा
पर अनतर्मन के शब्दों को क्या समय चक्र ने बाँधा है
क्या ह्रदय नेह की पीड़ाओं को काल चक्र ने थामा है
ऐ मंद हंसी, नादान परिंदा मैं इस जग का
कुछ कुंठाओं से जकड़ा था , कुछ सहमा और झिझकता था
भाभुकता के बशीभूत मैं स्वयं को पीड़ा देता फिरता था
चाहता था छूं लूँ अम्बर बन आजाद परिंदा मैं
पर साहस स्वयं नहीं करता था, गिर जाता था बस कुछ क्षण में
यही भूल बस होती थी, था लेता अन्य सहारा मैं
तुझे प्रत्यक्ष न कह पाया, ऐ मंद हंसी तू कितनी है प्यारी,
बस शुरू हो गया चक्र बही जिसमे सबको खो जाना था
तू गयी अधरों से मंद हंसी, बस मैं रह गया अधूरा था,
फिर हुआ बही जो होना था, एक नए रिश्ते में बंधना था
यह मेरे साथ नहीं केवल, यह तेरे साथ भी होना था
ऐ हद से प्यारी मंद हंसी, मैं तुझको नहीं भुला पाया
समय चक्र की चाल में मैं, खुद को नहीं बचा पाया,
सब रिश्तों में मैं बंधा रहा , था निभा रहा सबको भरपूर
नहीं डिगा कर्त्तव्य पथों से, गिरतों को था रहा उठा
पर समझा कोइ न पीड़ा मेरी, निकाल रहे थे अपना काम,
अब लगता अच्छा वैराग्य मुझे है, शायद उसमे है विश्राम
तेरा तो मैं हो न सका, जो होना है वह हो जाऊं
सब कहते मुझसे तू पागल है, इस भौतिकता में रमता नहीं
आदर्शों के चक्कर में तू हमको तो जमता ही नही
पर तू ही बता ऐ मंद हंसी, जब में बदला न पहले था
तो क्या अब अपने को बदलूंगा?
समझ सका न कोई मुझको, में भी कुछ समझा न सका
बस आदर्शों के चक्कर में खुशियाँ अपनी दफनाता रहा
इस हाड़ मांस के ढांचे में , पीड़ाएँ हैं बहुत छुपी
दफ़न रही थीं सीने में पर, चाहकर भी यह मिटी नहीं
उद्देश्य नहीं तुझे पीड़ा देने का, तू जीवन है कोई अंत नहीं
पर हद से प्यारी मंद हंसी क्या तुझको कभी भुला पाता
यह प्रेम नहीं था, तन का आकर्षण, आँखों में ही प्यार भरा
आँखें करती बातें जितनी, अंग दूसरा करता क्या?
ज्ञान पूर्ण है मुझको, कुछ सार नहीं इन सब बातों का
बस प्यार जो तुमसे है अगाध,
उसे शब्दों में बस गड़े जा रहा,
ऐ मंद हंसी नाराज न हो, न छेड़ूँगा कोई तान नई
चाहूंगा में बस इतना तुझसे न संशय रहे न संताप कोई
मुझे शब्दों के लिखने का और तुझे पड़ने का अधिकार वही
तुझे पड़ने का अधिकार वही ...........

-सुधांशु कौशिक 

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8 वर्ष पहले
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