मनकापुर की ये शामें धीरे-धीरे ढलती हैं,
और मेरे मन में कई कहानियाँ पलती हैं।
अंबेडकर नगर की गलियों से यहाँ तक आई हूँ,
कुछ सपने संजोकर मैं अपने साथ लाई हूँ।
कुछ सीखा है यहाँ, कुछ सिखाया भी है,
टूट कर खुद को फिर से बनाया भी है।
अच्छी-बुरी यादों का एक कारवां साथ चलता है,
कभी कभी भीड़ में भी मन बहुत उदास रहता है।
पति दूर हैं, पर उनका इंतज़ार अपना सा है,
सारे दिन पराए हूँ, बस शनिवार अपना सा है।
उनकी ही मेहनत से मेरा परिवार चलता है
उनके आने की आहट से घर-आंगन महकता है।
इस भागदौड़ में भी एक सुकून गहरा है,
कि मेरा कर्म सिर्फ मेरे घर तक नहीं ठहरा है।
सिर्फ अपने बच्चों को ही नहीं संभाल रही हूं,
मैं कई माँ-बाप के सपनों को भी पाल रही हूं।
उन नन्हें हाथों में कल का भविष्य गढ़ती हूँ,
जीवन के हर उतार-चढ़ाव का अर्थ पढ़ती हूँ।
बच्चों के मुँह से 'मेम' शब्द मुझे "मां"सा लगता है,
शब्द कुछ भी हो पर उनका भाव सच्चा सा लगता है।
उनके टूटे हौसलो को मैं नित आशाओं से सीती हूं,
और इस तरह मैं रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीती हूँ।
मनकापुर की शामें भले ही अकेली हैं,
पर इन शामों में मेरी कविताएँ सहेली हैं।
-सुधा पाण्डेय