आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये तन्हा शामें

                
                                                         
                            मनकापुर की ये शामें धीरे-धीरे ढलती हैं,
                                                                 
                            
और मेरे मन में कई कहानियाँ पलती हैं।

अंबेडकर नगर की गलियों से यहाँ तक आई हूँ,
कुछ सपने संजोकर मैं अपने साथ लाई हूँ।
कुछ सीखा है यहाँ, कुछ सिखाया भी है,
टूट कर खुद को फिर से बनाया भी है।

अच्छी-बुरी यादों का एक कारवां साथ चलता है,
कभी कभी भीड़ में भी मन बहुत उदास रहता है।

पति दूर हैं, पर उनका इंतज़ार अपना सा है,
सारे दिन पराए हूँ, बस शनिवार अपना सा है।
उनकी ही मेहनत से मेरा परिवार चलता है
उनके आने की आहट से घर-आंगन महकता है।

इस भागदौड़ में भी एक सुकून गहरा है,
कि मेरा कर्म सिर्फ मेरे घर तक नहीं ठहरा है।
सिर्फ अपने बच्चों को ही नहीं संभाल रही हूं,
मैं कई माँ-बाप के सपनों को भी पाल रही हूं।

उन नन्हें हाथों में कल का भविष्य गढ़ती हूँ,
जीवन के हर उतार-चढ़ाव का अर्थ पढ़ती हूँ।
बच्चों के मुँह से 'मेम' शब्द मुझे "मां"सा लगता है,
शब्द कुछ भी हो पर उनका भाव सच्चा सा लगता है।
उनके टूटे हौसलो को मैं नित आशाओं से सीती हूं,
और इस तरह मैं रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीती हूँ।

मनकापुर की शामें भले ही अकेली हैं,
पर इन शामों में मेरी कविताएँ सहेली हैं।
-सुधा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर