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रेत पर निशान

subhash yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई तो गया होगा ?
        
                                                    
                            
नदी की तरफ़
पांवों के निशान दिख रहे थे
अनगिनत चलकर ,
रेत पर उभरकर
दूर -दूर तक ...
हाँ ! लौटने का तो पता नही उसके
नज़र आया नही चिन्ह पाँव का
कहीँ- कहीँ जानवरों
के भी आने -जाने की थी पहचान
नन्हें कीडे भी चलकर
छोड़े थे अपने निशान
और हवा से
बनते -बिगड़ते
किसी कलाकृति की तरह
दिख रही थी लकीरें
रेत उभरकर
ग्रीष्म के आतप से
गंगा के बदन पर ॥

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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