कोई तो गया होगा ?
नदी की तरफ़
पांवों के निशान दिख रहे थे
अनगिनत चलकर ,
रेत पर उभरकर
दूर -दूर तक ...
हाँ ! लौटने का तो पता नही उसके
नज़र आया नही चिन्ह पाँव का
कहीँ- कहीँ जानवरों
के भी आने -जाने की थी पहचान
नन्हें कीडे भी चलकर
छोड़े थे अपने निशान
और हवा से
बनते -बिगड़ते
किसी कलाकृति की तरह
दिख रही थी लकीरें
रेत उभरकर
ग्रीष्म के आतप से
गंगा के बदन पर ॥
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