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परदा....

subhash yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच कहूँ तो मन पटल पर
        
                                                    
                            
आज भी परदे पड़े हैं
पलटने लगा पन्ना तो मेरा
ज्ञान अधूरा था
अब तक सोचता रहा
खुद को ज्ञानी,
समझता खूद में पूरा था
गलतफ़हमी थी मन की
ना जाने कितना ज्ञान अभी
अधूरा था
टँगे थे परदे के पीछे परदे
अनभिज्ञ जिनसे मन ,
किताब के पन्नों की तरह
जिसे कभी देखा नही पलटकर
ज्ञान की बाते जिसमे कुछ हटकर
किताबों पर किताबें
ग्रंथ ना जाने कितने
बाकी हैं एक परदे की तरह
मेरे मन पर॥

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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