सच कहूँ तो मन पटल पर
आज भी परदे पड़े हैं
पलटने लगा पन्ना तो मेरा
ज्ञान अधूरा था
अब तक सोचता रहा
खुद को ज्ञानी,
समझता खूद में पूरा था
गलतफ़हमी थी मन की
ना जाने कितना ज्ञान अभी
अधूरा था
टँगे थे परदे के पीछे परदे
अनभिज्ञ जिनसे मन ,
किताब के पन्नों की तरह
जिसे कभी देखा नही पलटकर
ज्ञान की बाते जिसमे कुछ हटकर
किताबों पर किताबें
ग्रंथ ना जाने कितने
बाकी हैं एक परदे की तरह
मेरे मन पर॥
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