आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परदा....

                
                                                         
                            सच कहूँ तो मन पटल पर
                                                                 
                            
आज भी परदे पड़े हैं
पलटने लगा पन्ना तो मेरा
ज्ञान अधूरा था
अब तक सोचता रहा
खुद को ज्ञानी,
समझता खूद में पूरा था
गलतफ़हमी थी मन की
ना जाने कितना ज्ञान अभी
अधूरा था
टँगे थे परदे के पीछे परदे
अनभिज्ञ जिनसे मन ,
किताब के पन्नों की तरह
जिसे कभी देखा नही पलटकर
ज्ञान की बाते जिसमे कुछ हटकर
किताबों पर किताबें
ग्रंथ ना जाने कितने
बाकी हैं एक परदे की तरह
मेरे मन पर॥

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर