मन लौट आता है फिर,
बिना कुछ सोच लिए
लटकाये हुए चेहरे को
हां ! जब सोचता हूँ
खुद को बैभव की बाते करते
ऊँची -ऊँची मंजिलो को गिनते
तो कुरेदता है मन निज को
उन बूढी कलाइयों पर
झुर्रीदार भरे हाथो पर
जो जीवन से लड़ते
देखा है धूप में
पथरो को तोड़ते
सिर्फ पेट भरने के लिए
सच कहुँ तो जिन्दा
रहने के लिए ,
हर- दिन मजदूरी पर
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