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मजदूर दिवस पर

majdoor divas par
                
                                                         
                            मन लौट आता है फिर,
                                                                 
                            
बिना कुछ सोच लिए
लटकाये हुए चेहरे को
हां ! जब सोचता हूँ
खुद को बैभव की बाते करते
ऊँची -ऊँची मंजिलो को गिनते
तो कुरेदता है मन निज को
उन बूढी कलाइयों पर
झुर्रीदार भरे हाथो पर
जो जीवन से लड़ते
देखा है धूप में
पथरो को तोड़ते
सिर्फ पेट भरने के लिए
सच कहुँ तो जिन्दा
रहने के लिए ,
हर- दिन मजदूरी पर

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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