बाजार में ,
यूँ ही एक नजर दौड़ गयी
खिलौनों की दुकान पर
खिलौने दिखे
हँसते -खिलखिलाते
बेजान होकर भी मानो
मन ही मन मुस्कुराते
और देखा आदमी को
जीवित गहन चिंतन में
लटकाये चेहरा लिये
उथल -पुथल निज मंथन में
देखता रहा खड़े -खड़े
आते जाते लोगों को
कभी खिलौनों पर
कभी आदमी पर
सोचता रहा देर तक
दोनों चेहरों पर ॥
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