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खिलौना

                
                                                         
                            बाजार में ,
                                                                 
                            
यूँ ही एक नजर दौड़ गयी
खिलौनों की दुकान पर
खिलौने दिखे
हँसते -खिलखिलाते
बेजान होकर भी मानो
मन ही मन मुस्कुराते
और देखा आदमी को
जीवित गहन चिंतन में
लटकाये चेहरा लिये
उथल -पुथल निज मंथन में
देखता रहा खड़े -खड़े
आते जाते लोगों को
कभी खिलौनों पर
कभी आदमी पर
सोचता रहा देर तक
दोनों चेहरों पर ॥

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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