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आशा चाहे कितनी छोटी हो, उसको कभी न खोना

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनजाने से पक्षी कलरव करते, मस्त मगन रहते,
        
                                                    
                            
दिन भर उड़ते, विचरण करते, वापस घर को आते।
नभ के ऊपर, नीचे उड़ते, चक्कर कई लगाते,
पेड़ के अंतिम छोर बसेरा, किसका डर वे खाते?

नदी किनारे सुंदरतम, अति रमणीय सघन वन था,
नन्हे बच्चों सहित वहाँ, पक्षी-दंपति का घर था।
मंद बयार की लहरों में, बच्चे झूला करते,
माँ के आते ही चूँ-चूँ कर, प्रेम-मिलन वे करते।

सावन की हरियाली देख, बच्चे सुकून पाते,
धान के ताजे दाने पाकर, खुशियाँ खूब मनाते।
माँ-बाप के स्नेहिल साए में, दिन उनके कटते थे,
छोटे-छोटे पंखों से वे, सपनों में उड़ते थे।

एक दिवस नदी में बाढ़ आई, जल ने रूप विकराला,
देखते-देखते बहने लगा, जंगल का हर डाला।
जिस वृक्ष पर घर था उनका, वह भी धारा में बह गया,
पल भर में ही उनका सुंदर, आशियाना ढह गया।

पक्षियों की उम्मीदों पर भी, पानी फिरता जाता,
आशा का दीपक बुझता जाता, मन घबराता जाता।
बेघर होकर लाचार हुए, उड़कर कहाँ वे जाते?
चारों ओर था पानी ही पानी, किससे मदद वे पाते?

नन्हे बच्चे भूखे-प्यासे, माँ से लिपट गए सारे,
पिता पक्षी भी हिम्मत बाँधें, बोले—“डरना मत प्यारे।
घर उजड़ा है, हौसला नहीं, हम फिर घर बनाएँगे,
टूटी डाली छोड़ किसी दिन, नया बसेरा पाएँगे।”

बाढ़ उतरने लगी धीरे-धीरे, धरती फिर मुस्काई,
सूखी टहनी, घास और पत्तों ने फिर आस जगाई।
पक्षी दोनों जुटे काम में, तिनका-तिनका लाते,
मेहनत करके ऊँची डाली पर, नया नीड़ सजाते।

बच्चों ने भी पंख पसारे, उड़ना धीरे सीखा,
गिरकर फिर उठने का साहस, जीवन ने उन्हें बताया।
कुछ दिन बाद वही कलरव फिर, जंगल में सुनाई दिया,
उजड़े घर के स्थान पर फिर, सुंदर नीड़ दिखाई दिया।

देख प्रकृति भी मुस्काई, जीवन फिर से आया,
छोटे पंखों ने बड़े संकट पर, अपना रंग दिखाया।
बाढ़ ने उनसे घर छीना था, हिम्मत छीन न पाई,
मेहनत, साहस, धैर्य से उन्होंने, नई सुबह फिर पाई।

सीख यही है जीवन में, संकट से कभी न हारो,
टूटे सपनों को फिर जोड़ो, हिम्मत का दीपक धारो।
प्रकृति हमारी माँ है, इसका संतुलन मत बिगाड़ो,
वन, नदी और वृक्ष बचाकर, जीवन का संसार सँवारो।

आशा चाहे कितनी छोटी हो, उसको कभी न खोना,
अंधियारे के बाद सदा ही, सूरज को है होना।
मेहनत, साहस, धैर्य रखो, मंजिल दूर नहीं है,
गिरकर फिर उठ जाना ही तो, जीवन की हार नहीं है।
-सूबा लाल "अंजाना"
4 घंटे पहले
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