साँसें हैं चलतीं, चली जा रही हैं,
जीवन की आशा जगी जा रही है।
कोई उम्र भर की उम्मीदें लिए,
कोई चंद साँसों में चला जा रहा है।
जो स्वस्थ रहकर नियमित रहा है,
खान-पान, स्नान, ध्यान में लगा है।
नियमित व्यायाम करता जो हर दिन,
निरोगी वो साँसें लिए जा रहा है।
रक्षा-कवच सच्ची ईमानदारी है,
मानवता ही जीवन की हिस्सेदारी है।
परहित में जीवन जो जिए जा रहा है,
अमृत-सा जीवन वही पा रहा है।
चिंता-रहित जो साँसों का धनी है,
गलत राह से जिसकी दूरी बनी है।
बेफिक्र, निश्चिंत, सुखी वो रहा है,
ईर्ष्या छोड़ खुशियाँ लुटा रहा है।
न जाने ये साँसें कब थम जाएँगी,
कब जीवन की राहें बदल जाएँगी।
जो पल मिला है, उसे जी लो हँसकर,
यही साँसें फिर कहाँ लौट पाएँगी।
नेकी की राहों पर कदम जो बढ़ाये,
दुखियों के जीवन में खुशियाँ जो सजाये।
वही साँसें, सार्थक किए जा रहे हैं,
जग में निशानी छोड़ जिये जा रहे हैं।
-सूबा लाल "अंजना"