पवन के अदृश्य पटल पर,
न लिख पाऊँ, न ही पढ़ पाऊँ,
पर इसके माध्यम से दिल की,
मैं सारी बातें कह पाऊँ।
आती है ना जाने कहाँ से,
जाती कहाँ पे है,
कब आती, कब जाती है,
छूने से समझ पाऊँ।
फूलों की खुशबू लेकर तुम,
दूर तलक उड़ जाती हो,
पत्तों को जब छूकर जाती,
मधुर गीत गाती हो।
बादल को तुम साथ लिए जब,
आकाशों में जाती हो,
वर्षा बनकर धरती पर फिर,
जीवन-रस बरसाती हो।
कभी मंद-मंद मुस्काती हो,
कभी वेग दिखाती हो,
कभी तूफानी रूप को लेकर,
विनाश भी कर जाती हो।
पंछी के पंखों को सहला,
उसकी उड़ान बढ़ाती हो,
नाविक की नैया को छूकर,
उसकी राह बनाती हो।
जीना भी तुमसे संभव है,
बिन तेरे न जल पाऊँ,
देती जैसे जीवन सबको,
तुमसे मिट्टी मिल पाऊँ
मेरे तन की हर एक साँस में,
तेरा ही तो वास है,
तेरे बिन यह जीवन जैसे,
सूना-सा आकाश है।
तेरी शक्ति की न सीमा कोई,
न ही कोई आकार,
कुछ भी कहे कोई तुझको,
मैं कहूँ तुझे निराकार।
न दिखती हो, फिर भी हर पल,
तेरी उपस्थिति पाऊँ,
हे पवन! तेरे स्पर्श मात्र से,
जीवन का अर्थ समझ पाऊँ।
-सूबा लाल "अंजाना"