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नश्वर जग का सत्य समझकर

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत लालची हूँ मैं,
        
                                                    
                            
मनके-सा गुंथा हुआ हूँ,
जिस धागे से जुड़ा हुआ हूँ,
उसी में बँधा हुआ हूँ।

जग की मधुमय माया में,
लिप्त पड़ा मुस्काता हूँ,
जितना इसको भोग रहा हूँ,
उतना ही फँसता जाता हूँ।

यह मेरा है, वह तेरा है,
तृष्णा बढ़ती जाती है,
पूरा जीवन बीत रहा,
मुट्ठी फिर भी खाली है।

धन-संपदा के संचय में,
जीवन सारा खप जाता,
एक तिनका भी साथ न चलता,
मनुष्य अकेला रह जाता।

संतोष महामंत्र बनकर,
जीवन में यदि आ जाए,
लोभ-मोह के इस बंधन से,
मन सहज मुक्त हो जाए।

नश्वर जग का सत्य समझकर,
कर्मों को आधार बनाऊँ,
खाली हाथ जगत में आया,
खाली हाथ ही चला जाऊँ।
-सूबा लाल "अंजाना"
3 घंटे पहले
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