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करवा चौथ का सजा बाजार

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज भीड़ देखी बाजारों में,
        
                                                    
                            
करवा, छन्नी, चुन्नी, सींक।
रेवड़ी, गट्टा, लाई, चिवड़ा,
केले, सेब, मिठाई बेशुमार।

खुशियाँ अपनी एक तरफ थीं,
नई साड़ियाँ, नए-नए सूट,
श्रृंगार के सामान सजे थे,
मन में पति के मान बसे थे।

भूख-प्यास को भूलकर मन में,
आशाओं के दीप जलाती,
पति की लंबी उम्र की खातिर,
व्रत रखती, मुस्कान सजाती।

चाँद खिलेगा, नैन मिलेंगे,
छन्नी से दीदार मिलेगा,
पति का चेहरा निहारकर फिर,
मन को असीम करार मिलेगा।

करवा चौथ के आने से पहले,
मन में बड़ा तूफान मचा था,
सोच-सोचकर सूची बनती थी,
खुशियों का बाजार सजा था।

किस साड़ी में रूप निखरेगा,
किस बिंदी से माथा दमकेगा,
किस चूड़ी की खनक सुनाकर,
मन का आँगन और महकेगा?

मेहँदी रचे हाथों में अपने,
पिया के नाम की लाली है,
आँखों में सपने हैं सुंदर,
मन में प्रेम की हरियाली है।

दिनभर भूखी, प्यासी रहकर,
चाँद निकलने का इंतजार,
एक झलक में मिट जाती है,
मन की पीड़ा, मन का भार।

यह केवल उपवास नहीं है,
प्रेम और विश्वास की डोर,
सुख-दुख में संग-संग चलने का,
जीवन भर का मधुर निचोड़।

पर प्रेम तभी पूरा होगा,
जब दोनों का मान रहेगा,
एक-दूजे की पीड़ा समझें,
घर में प्रेम का दीप जलेगा।

व्रत की गरिमा बनी रहेगी,
जब आपस में प्यार रहेगा,
पत्नी का सम्मान जहाँ हो,
वहीं सदा त्योहार रहेगा।
— सूबा लाल 'अंजाना'
13 घंटे पहले
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