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एक अनजान से जीवनसंगिनी तक

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक अनजान, जिसे हमने न देखा था कभी,
        
                                                    
                            
बनके मेरी आत्मा एक दिन वो आई घर मेरे।
जिसे समझा न कभी, जान न पाया था उसे,
बन गई मेरी जिंदगी, दे गई पहचान मुझे।

नए घर की नई चौखट पर, कितने चेहरे पाए,
अनजाने उन रिश्तों को, अपनेपन से अपनाए।
मेरे माता-पिता को उसने, अपना मान लिया,
मेरे हर रिश्ते को उसने, दिल में स्थान दिया।

मेरे सुख में हँसी हमेशा, मेरे दुःख में रोई,
मेरी खामोशी पढ़ लेती, बिना कहे ही कोई।
छोटी छोटी-सी जरूरत का, रखती ध्यान मेरी,
धीरे-धीरे बनी जीवन की वो पहचान मेरी

कभी माँ बन करके, ममता का वो संसार दिया,
बनकर पत्नी कभी, जीवन का वो आधार दिया।
मित्र बनकर कभी उलझन को सुलझाया उसने,
मौन रह करके मन का दर्द समझाया उसने।

समय बदलता गया मगर प्रेम उसका न बदला,
जीवन के किसी मोड़ पर उसने न मेरा हाथ छोड़ा।
मेरी जीत में गर्व किया, हार में साहस भी दिया,
गिरने पर उठना उसने चलने का विश्वास दिया।

मैंने सोचा था एक अनजान, आई है घर मेरे,
कब मेरी साँसों में बस गई, मुझे पता ही नहीं ।
मित्रता से आगे बढ़कर, बन गई वो जान मेरी,
अब रहती हर धड़कन में , उसकी ही कहानी मेरी।

वो केवल पत्नी नहीं , वो है मेरे जीवन की डोर,
उसके बिना लगता अधूरा मेरा हर एक छोर।
दो शरीर भले ही हों, पर एक हुई पहचान मेरी
उसके संग पूर्ण हुई है, ये जीवन-गीत मेरी।

आज अगर पीछे मुड़कर, जीवन को अपने मैं देखूँ,
सबसे सुंदर रिश्तों में, उसका चेहरा ही दिखता है।
जिसे कभी जाना न था, वो जीवन संगिनी निकली,
मेरी जिंदगी की राहों में, वो सदा मेरी मंजिल तक चली।
-सूबा लाल "अंजाना"
3 घंटे पहले
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