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बोझ न बन जाऊँ

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बढ़ती उम्र के इस पड़ाव पर,कहीं बोझ न मैं बन जाऊँ।
        
                                                    
                            
कुछ भी नहीं चाहिए उनसे,कैसे उनको समझाऊँ?

जब-जब बच्चे आते हैं घर,कुछ न कुछ साथ में लाते,
नहीं चाहता खर्च हो उनका,फिर भी कुछ कह नहीं पाते।

जन्मदिन या सालगिरह पर,यादगार कुछ ले आते,
घर में कुछ भी कम नहीं है,कैसे उनको हम बतलाते?

जिन उँगलियों ने थाम कभी,मेरे हाथों को चलना सिखलाया,
आज उन्हीं हाथों का सहारा,जब चाहूँ, तो कैसे पाऊँ?

जब पाँव थकें, जब राह रुके,जब चलना मुश्किल हो जाए,
बस अपना कोई हाथ पकड़ ले,मन को कितना सुख मिल जाए।

एक रोटी, दाल साथ में हो,प्यार की चटनी पाऊँ,
मीठे वचन, जरा-सा सम्मान,यदि आज कहीं पा जाऊँ।

न धन चाहिए, न महल चाहिए,न कोई उपहार सजाऊँ,
अपनों के दो बोल प्रेम के,बस उनको सुनता जाऊँ।

बच्चों पर भार कभी न बनूँ,इतनी ही इच्छा मन में है,
उनकी खुशियों की राह में,न मेरी कोई बाधा हो।

कल जिनके लिए जीवन भर,हर मुश्किल से मैं लड़ता आया,
आज उन्हीं के स्नेह तले बस,थोड़ा-सा सुख पाना चाहूँ।

बस इतना ही साथ रहे तो,जीवन धन्य मनाऊँ,
और किसी से कुछ भी न माँगूँ,और न कुछ भी चाहूँ।

बढ़ती उम्र के इस पड़ाव पर,कहीं बोझ न मैं बन जाऊँ।
कुछ भी नहीं चाहिए उनसे,कैसे उनको समझाऊँ?
-सूबा लाल "अंजाना"
4 घंटे पहले
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