बहुत ख़ास ये ज़िंदगी है, सँभालो,
इसे व्यर्थ के झगड़ों में मत उछालो।
मिले जो खुशी, उसको जी भर के जी लो,
नफ़रत भुलाकर मोहब्बत में ढालो।
न कल का भरोसा, न पल का ठिकाना,
है मिट्टी का तन, एक दिन इसने जाना।
कैसी ग़ुरूर और, कैसी ये शान है,
यहीं छूट जाएगा सारा ख़ज़ाना।
किसी की हँसी का सबब भी तू बनना,
गिरों को उठाना, न दुख में तू डरना।
जो आँसू किसी के अगर तुम मिटा दो,
उसी पुण्य से जीवन का गुलशन सजाना।
न दौलत हमेशा, न शोहरत रहेगी,
न अपनों की महफ़िल हमेशा सजेगी।
कर्मों की खुशबू ही संग में चलेगी,
तुम्हारी भलाई ही दुनिया कहेगी।
गुज़र जो गया, उसको जाने भी दो,
नाराज़ जो है, उसे मनाने भी दो।
बहुत छोटी है ,प्रेम से तुम चला लो,
बहुत ख़ास ये ज़िंदगी है, सँभालो!
— सूबा लाल ‘अंजाना’