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विहंगम

SONI KUMARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं विहंगम,
        
                                                    
                            
कोई न समझे मेरा ग़म।

प्रभात की पहली किरण को पहले,
मैंने पहचाना है।
भूल गर्व में मानव ने,
मेरे घर को उजाड़ा है।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

अपने चोंच में चिट्ठी रखकर,
कभी मैंने भी पहुंचाया है।
आधुनिक समझ की दुनिया ने नोंच-नोंच कर,
मेरा वंश उजाड़ा है।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

समस्त पक्षी चोंच में दाने और बीज भरकर,
सृष्टि में पेड़ का सृजन करतें हैं।
दिखावे का एक बीज बोकर,
ये मानव जंगल काट डालते हैं।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

चलो हम अपनी ग़लती स्वीकार करतें हैं,
जन्म न लें सकेंगे फिर कभी।
विलुप्त होकर,
हम तुम्हें आबाद करतें हैं।।
-सोनी कुमारी
7 महीने पहले
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