आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विहंगम

                
                                                         
                            मैं विहंगम,
                                                                 
                            
कोई न समझे मेरा ग़म।

प्रभात की पहली किरण को पहले,
मैंने पहचाना है।
भूल गर्व में मानव ने,
मेरे घर को उजाड़ा है।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

अपने चोंच में चिट्ठी रखकर,
कभी मैंने भी पहुंचाया है।
आधुनिक समझ की दुनिया ने नोंच-नोंच कर,
मेरा वंश उजाड़ा है।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

समस्त पक्षी चोंच में दाने और बीज भरकर,
सृष्टि में पेड़ का सृजन करतें हैं।
दिखावे का एक बीज बोकर,
ये मानव जंगल काट डालते हैं।।

मैं विहंगम,
कोई न समझे मेरा ग़म।

चलो हम अपनी ग़लती स्वीकार करतें हैं,
जन्म न लें सकेंगे फिर कभी।
विलुप्त होकर,
हम तुम्हें आबाद करतें हैं।।
-सोनी कुमारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर