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गर्मी पर कविता

shyam naresh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कड़क धूप है छाव नही, गर्मी है अब बाह पसारे।
        
                                                    
                            
गर्मी बढ़ती जाएगी तो, रहोगे तुम किसके सहारे।।

वृक्षों को जो काट रहे है, वह क्षणिक सुख ही देते है।
अपनी ज़रा खुशी के खातिर, वह प्रकृति से खेल लेते है।।

अम्बर से आग बरसती है, अब कौन इसे खा सकता है।
जिसको तुम अब काट रहे हो, सर्वनाश वह कर सकता है।।

जल-कल मधुकर और विटप, इनको न तुम अब व्यर्थ करो।
एक एक बूंद सँजोकर तुम अब, वृक्षों का सही अर्थ करो।।

सुख की आंधी में बहकर तुम, प्रकृति से न छेड़छाड़ करो।
थोड़ा सा तुम देशी बनकर, स्रष्टि हेतु निर्माण करो।।

आयु कम होती है जाती, यह कैसी वैज्ञानिकता है।
गाँवो से गंदे शहरों के बनने की, यह कैसी मानसिकता है।।

जहां प्रदूषण बहुत हो रहा, उसको तुम विकसित कहते हो।
जो लोगो को अन्न दे रहा, उसे अशिक्षित कहते हो।।

आज नही तुम संभल सके तो, रवि का तुम आभास करोगे।
खोज भले कितनी भी कर लो, संघर्षों में वास करोगे।।

नरेश यही कहता है तुमसे, अब भी सब सम्भल जाओ।
जल,विटप,वायु ,धरा को शपथ लेकर,जीवन देकर बचाओ।।

गौपुत्र श्याम नरेश दीक्षित

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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