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इंसाफ की आवाज़, नफ़रत नहीं

Shweta Chaurasia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आवाज़ उठाओ…
        
                                                    
                            
मगर नफ़रत मत बनाओ।
गलत हुआ है तो सवाल करो,
खामोशी को स्वीकार मत करो।
जिसने ज़ुल्म किया, उसे सज़ा मिले,
जिसने देखा, वो भी चुप न रहे।
मगर हर मर्द को गुनहगार कह देना—
क्या सच में इंसाफ़ कहलाएगा?
एक की गलती का बोझ
हर कंधे पर क्यों डाला जाएगा?
ज़ुल्म करने वाला मर्द हो सकता है,
मगर उसे देखकर चुप रहने वाला
समाज भी तो होता है।
कभी चुप खड़ी भीड़,
कभी घर की बंद दीवारें,
कभी अपनों का मौन समर्थन…
क्योंकि अपराधी का कोई लिंग नहीं,
उसकी पहचान सिर्फ़ उसका अपराध है।
जो गलत कर रहा है, उसे रोको।
जो चुप है, उसे जगाओ।
और जो पीड़ित है,
उसका हाथ थामो।
क्योंकि समाज
सिर्फ़ औरतों से नहीं,
सिर्फ़ मर्दों से भी नहीं—
समाज हम सब हैं।
इसलिए लड़ाई
किसी एक लिंग के खिलाफ़ नहीं,
हर उस सोच के खिलाफ़ हो
जो इंसानियत को छोटा करती है।
आवाज़ इतनी बुलंद हो
कि ज़ुल्म डर जाए…
पर इतनी ज़हरीली नहीं
कि इंसानियत मर जाए।
इंसाफ़ माँगो…
नफ़रत नहीं।

— श्वेता चौरसिया
3 घंटे पहले
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