विज्ञापन

जीना उसका ही जीना है, जो औरों पर हो निसार।

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जाने क्यों यह दिल मेरा रोता है बार-बार,
        
                                                    
                            
शायद इसे मिला नहीं कोई ग़मगुसार।

सुलगते-सुलगते सीने में धुआँ हुई ख्वाहिशें,
न जाने जलना है इसे और कितनी बार।

कतराने लगे हैं सब कि माँग न लूँ हक़ अपना,
लगा यूँ कि सबने कर दिया मुझे दरकिनार।

काँटे बो कर फूलों की चाहत, ये तो नादानी है,
जैसा करोगे वैसा भरोगे यही है दस्तूर-ए-संसार।

सीखें हम प्रकृति से, जो सिर्फ़ देना जानती है,
जीना उसका ही जीना है, जो औरों पर हो निसार।
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10784 कविताएं

View Profile

Chitra Panwar

31 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ipsita Bhadauria

37 कविताएं

View Profile